राम विट्ठल शिक्षण सेवा समिति द्वारा
स्थापित शोध संस्थान का उद्घाटन करते हुए उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया
नायडू ने प्राचीन दार्शनिक वैचारिक और साहित्यिक विरासत के संरक्षण और
संवर्धन की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि इस कार्य के लिए आधुनिक डिजिटल
तकनीक का उपयोग किया जाना चाहिए तथा इस ज्ञान भण्डार को शोध कर्ताओं को
उपलब्ध कराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमारे प्राचीन दर्शन ग्रन्थों,
वेद, वेदांग में निहित ज्ञान का आधुनिक समाज की अपेक्षाओं और आवश्यकताओं के
परिपेक्ष्य में शोध किया जाना चाहिए।
इस संदर्भ मैं उपराष्ट्रपति ने आयुर्वेद, राजनीति और अर्थशास्त्र, नैतिकता और दर्शन आदि विषयों पर भारतीय ग्रंथों में उपलब्ध ज्ञान पर विशेष शोध की आवश्यकता पर जोर दिया। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपई द्वारा प्रारंभ किए गए राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन का उल्लेख करते हए उपराष्ट्रपति ने आशा व्यक्त की कि नया शोध संस्थान भी इस मिशन से जुड़ कर प्राचीन पांडुलिपियों का संकलन और संरक्षण करेगा।
उद्घाटन के अवसर पर गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह तथा पेयजल एवं स्वच्छता मंत्री सुश्री उमाभारती भी उपस्थित थीं।
Following is the text of Vice President’s address in Hindi:
“हमारी प्राचीन ज्ञान संपदा के संरक्षण और संवर्धन के लिये स्थापित किये जा रहे इस शोध संस्थान के उद्घाटन के शुभ अवसर पर आपके स्नेहिल आमंत्रण के लिये आप सभी का हृदय से आभारी हूँ।
मित्रों,
गतवर्ष देश के उपराष्ट्रपति के रूप में पदभार ग्रहण करने के बाद से, मेरा अनवरत प्रयास रहा है कि मैं शिक्षण संस्थाओं, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक शोध संस्थानों में जाकर वहाँ मेधावी युवाओं, उद्यमियों, वैज्ञानिकों, शोधकर्त्ताओं से मिलूँ, उनके साथ अनुभव और आशा-आकांक्षा साझा करूँ। ये अनुभव मेरे लिये अमूल्य रहे हैं। इनमें से प्रत्येक यात्रा एक तीर्थयात्रा के समान रही है। राष्ट्र के भविष्य के प्रति युवाओं की जीवंत आशा और हमारी गौरवशाली संस्कृति में उनकी अटूट आस्था ने मुझे प्रेरित किया है। आज इस अवसर पर पुन: मुझे, हमारी समृद्ध संस्कृति, ज्ञान परंपरा और युवा अपेक्षाओं की इस जीवनदायनी त्रिवेणी के दर्शन हो रहे हैं।
मित्रों,
मुझे राम विट्ठल शिक्षण सेवा समिति द्वारा शिक्षा और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिये किये जा रहे प्रयासों की जानकारी मिली है।
आपने भारतीय दर्शन पर ग्रंथों की मूल पांडुलिपियों को संरक्षित करने का अभिनंदनीय प्रयास किया है।
इसके अतिरिक्त भारतीय दर्शन और ज्ञान परंपरा पर संस्कृत, कन्नड, हिंदी और अंग्रेंजी भाषाओं में आधिकारिक कोष तैयार किये हैं। संस्था ने भारतीय दर्शन, राजनीति और अर्थशास्त्र पर विद्वानों द्वारा कई व्याख्यान आयोजित किये हैं और कई शोधपरक प्रकाशन भी निकाले हैं।
आपके प्रयास हमारे प्राचीन ज्ञान के संरक्षण और संवर्धन में सार्थक हों और भावी शोधार्थियों के लिये सहायक हों। मेरी शुभकामना है।
शोध संस्थान में अपने पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने के लिये आधुनिक तकनीक का प्रयोग किया जायेगा। प्रस्तावित शोध संस्थान वेद, वेदांग, दर्शन तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों की मूल पांडुलिपियों को Digitise करेगा और उन्हें अन्य शोध संस्थानों को भी उपलब्ध करायेगा।
मुझे स्मरण है कि अटल जी ने भी पांडुलिपियों के Digitisation के लिये National Manuscript Mission प्रारंभ किया था। अगर संभव हो तो आप इस Mission का लाभ उठायें।
प्राचीन ज्ञान का संरक्षण और नये ज्ञान और तकनीकी के प्रति आग्रह ही किसी समाज को जीवंत बनाता है और उसकी ज्ञान परंपरा को प्रासंगिक बनाये रखता है।
मित्रों,
मुझे बड़ी प्रसन्नता है कि आपका शोध संस्थान हमारे प्राचीन ग्रंथों की मूलप्रतियों का संकलन करेगा, उन्हें Digitise करायेगा और उनपर शोध, अध्ययन को प्रोत्साहित करेगा। राष्ट्र का सांस्कृतिक-नवचेतना को जागृत करने में आपका सहयोग अभिनंदनीय है।
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इस संदर्भ मैं उपराष्ट्रपति ने आयुर्वेद, राजनीति और अर्थशास्त्र, नैतिकता और दर्शन आदि विषयों पर भारतीय ग्रंथों में उपलब्ध ज्ञान पर विशेष शोध की आवश्यकता पर जोर दिया। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपई द्वारा प्रारंभ किए गए राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन का उल्लेख करते हए उपराष्ट्रपति ने आशा व्यक्त की कि नया शोध संस्थान भी इस मिशन से जुड़ कर प्राचीन पांडुलिपियों का संकलन और संरक्षण करेगा।
उद्घाटन के अवसर पर गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह तथा पेयजल एवं स्वच्छता मंत्री सुश्री उमाभारती भी उपस्थित थीं।
Following is the text of Vice President’s address in Hindi:
“हमारी प्राचीन ज्ञान संपदा के संरक्षण और संवर्धन के लिये स्थापित किये जा रहे इस शोध संस्थान के उद्घाटन के शुभ अवसर पर आपके स्नेहिल आमंत्रण के लिये आप सभी का हृदय से आभारी हूँ।
मित्रों,
गतवर्ष देश के उपराष्ट्रपति के रूप में पदभार ग्रहण करने के बाद से, मेरा अनवरत प्रयास रहा है कि मैं शिक्षण संस्थाओं, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक शोध संस्थानों में जाकर वहाँ मेधावी युवाओं, उद्यमियों, वैज्ञानिकों, शोधकर्त्ताओं से मिलूँ, उनके साथ अनुभव और आशा-आकांक्षा साझा करूँ। ये अनुभव मेरे लिये अमूल्य रहे हैं। इनमें से प्रत्येक यात्रा एक तीर्थयात्रा के समान रही है। राष्ट्र के भविष्य के प्रति युवाओं की जीवंत आशा और हमारी गौरवशाली संस्कृति में उनकी अटूट आस्था ने मुझे प्रेरित किया है। आज इस अवसर पर पुन: मुझे, हमारी समृद्ध संस्कृति, ज्ञान परंपरा और युवा अपेक्षाओं की इस जीवनदायनी त्रिवेणी के दर्शन हो रहे हैं।
मित्रों,
मुझे राम विट्ठल शिक्षण सेवा समिति द्वारा शिक्षा और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिये किये जा रहे प्रयासों की जानकारी मिली है।
आपने भारतीय दर्शन पर ग्रंथों की मूल पांडुलिपियों को संरक्षित करने का अभिनंदनीय प्रयास किया है।
इसके अतिरिक्त भारतीय दर्शन और ज्ञान परंपरा पर संस्कृत, कन्नड, हिंदी और अंग्रेंजी भाषाओं में आधिकारिक कोष तैयार किये हैं। संस्था ने भारतीय दर्शन, राजनीति और अर्थशास्त्र पर विद्वानों द्वारा कई व्याख्यान आयोजित किये हैं और कई शोधपरक प्रकाशन भी निकाले हैं।
आपके प्रयास हमारे प्राचीन ज्ञान के संरक्षण और संवर्धन में सार्थक हों और भावी शोधार्थियों के लिये सहायक हों। मेरी शुभकामना है।
शोध संस्थान में अपने पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने के लिये आधुनिक तकनीक का प्रयोग किया जायेगा। प्रस्तावित शोध संस्थान वेद, वेदांग, दर्शन तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों की मूल पांडुलिपियों को Digitise करेगा और उन्हें अन्य शोध संस्थानों को भी उपलब्ध करायेगा।
मुझे स्मरण है कि अटल जी ने भी पांडुलिपियों के Digitisation के लिये National Manuscript Mission प्रारंभ किया था। अगर संभव हो तो आप इस Mission का लाभ उठायें।
प्राचीन ज्ञान का संरक्षण और नये ज्ञान और तकनीकी के प्रति आग्रह ही किसी समाज को जीवंत बनाता है और उसकी ज्ञान परंपरा को प्रासंगिक बनाये रखता है।
मित्रों,
मुझे बड़ी प्रसन्नता है कि आपका शोध संस्थान हमारे प्राचीन ग्रंथों की मूलप्रतियों का संकलन करेगा, उन्हें Digitise करायेगा और उनपर शोध, अध्ययन को प्रोत्साहित करेगा। राष्ट्र का सांस्कृतिक-नवचेतना को जागृत करने में आपका सहयोग अभिनंदनीय है।
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